सचिन पायलट पर देखो कैसे खेल हो रहा है फिर कहते है कांग्रेस लूटी क्यों , @SachinPilot लोगों के दिलो में है तस्वीरो से गायब करने से कुछ नहीं होगा . बच्चों वाली हरकते है कांग्रेसी लोगो की
मुझे लग रहा है मीडिया ने गलत बंदा छेड़ दिया है,
अगर ये लड़ाई थोड़े दिन और चली तो, मीडिया में बहुत जल्द ही बदलाव देखने को मिलेगा।
अब गर्दा उड़ेगा भइया.....
यही दुनिया का एक कड़वा सच है । लोग इस बात पर मायूस हो रहे हैं कि बशीर बद्र साहब के जनाज़े में लोग बहुत कम थे । लोग इस बात पर ग़म कर रहे कि भोपाल जैसी नगरी में भी लोग नही आए । कुछ लोगों को दुःख है कि पद्मश्री प्राप्त शायर और इस हुक़ूमत के पुरखों का दोस्त बिना गॉर्ड ऑफ ऑनर मिट्टी में दफ़न हो गया । हम देखते हैं कि लोगों के दुःख कैसे कैसे है ।
कुछ का कहना है कि जिस तरह कल से ऑनलाइन उनको ट्रिब्यूट दिया गया,ज़मीन पर कंधे उसके मुकाबले उंगलियों की गिनती पर थे ।
सच पूछिए हमें अब भीड़ से फ़र्क़ नही पड़ता । गुंडे मवालियों के यहां लाखों की भीड़ जमा हो जाती है, बस आप ताक़त में हों । सारा खेल उस ताक़त का है, जो लोगों को घर से निकलने को मजबूर कर देती है । अब बहुत कम लोग अपनी रूह की आवाज़ सुनकर आते हैं । अब तो भीड़ अपने फ़ायदे, अपनी ज़रूरत और सामने वाले कि ताक़त पर आती है । यह भीड़ हमेशा आएगी,बस जगह बदलती रहेंगी । जिधर ताक़त,उधर अथाह भीड़...
बशीर बद्र साहब पिछले बहुत से सालों से याददाश्त की कमी से जूझ रहे थे । परिवार और दोस्त,इनका दायरा उनकी ज़िंदगी मे सिमट रहा था । अब न वह किसी को इंटरव्यू देकर उसकी दुकान चला सकते थे और न ही मुशायरों में कहीं जा सकते थे । एक कलाकार जब कला से दूर हो जाता है, वह उसी दिन ख़त्म हो जाता है । दुनिया भले कहती रहे कि वह ज़िंदा है, उसे तो पता है कि यह जिस्म तुम देख रहे हो,तुम वह नही देख रहे हो जो इस जिस्म को ज़िंदा रखे थी ।
वैसे भी कलाकार,लेखक,शायर,कवि इनकी रचनाएँ ही ज़िंदा रहती हैं । आपके ठीक बग़ल में बैठा लड़का आपको पढ़ रहा होता है मगर जान नही रहा होता । पढ़े जाने का सुख और न पहचाने जाने का दुःख से उपजा जो खट्टा मीठा ज़ायक़ा है, कुल जमा वह ही है ।
मैं बहुत से जनाज़ों में गया,कितने ही लेखक ख़त्म हुए । कहीं भीड़ थी तो कहीं नही थी । कई बार लेखक,शायर का परिवार भी इस दायरे से कट चुका होता है । सही मैसेज,टाइमिंग और जगह का पता नही चल पाता,कुछ लोग चाहकर नही पहुँच पाते ।।यह सब होता है, इसमें बहुत ग़म नही करना चाहिए ।
भीड़ किसके लिए होती,मरने वाला मर गया । अब चाहे लाखों लोग आए,चाहे चार लोग आए । हर एक अपने लिए आता है । कोई अपने दिल का बोझ हल्का करने,कोई अपनी यादों के बोझ तले,तो कोई इसलिए कि चलो,इतना किया है तो आख़िर के दो कदम हम भी इनके पीछे चल दें । मगर इन सबका प्रभाव किस पर पड़ता है, कौन देखता है ।
इस तरह के लोग जो रचते हैं, वह ही जनाज़े के कंधे हैं और वह असंख्य है । भीड़ वहां भले मौजूद न हो मगर भीड़ के ज़हन में तो वह मौजूद हैं । जनाज़े के पीछे की भीड़ उन्हें नही ज़िंदा रखेगी,उन्हें या उनके जैसों को उनकी रचनाएँ ज़िंदा रखेंगी ।
जिसने शेर को मुहावरा बना दिया हो । हर ज़बान पर जिसकी पहुँच हो,जो लोगों के कमज़ोर से कमज़ोर ज़हन में अपना एक मिसरा, एक शेर पैबस्त करवा दे । उसके जनाज़े की भीड़ नही देखी जाती । उसकी याद में दुनिया भर में अफ़सोस करते लोगों को देखिए । अब तो वह हमेशा ही याद किये जाएंगे,शहर शहर उनपर चर्चा होंगी, नस्ले नस्ले उन्हें पढ़ेंगी ।
मुझे भीड़ का दुःख नही होता । एक कहानी बड़ी सच्ची बचपन मे सुन ली थी कि भरी जवानी और ताक़त के दिनों में ज़मींदार साहब का कुत्ता मर गया,तो हजारों की भीड़ उमड़ी अफसोस करने । फिर बुढ़ापे में बेगम ख़त्म हुईं तो सैकड़ों की भीड़ आई अफसोस करने और फिर खुद ज़मींदार साहब ख़त्म हुए तो कुछ रिश्तेदार और कुछ नौकर चाकर ही थे जनाज़े में,यह क्यों हुआ क्योंकि ताक़त नही बची उस चौखट में,जब वह खुद ही नही रहे....
ग़म मत कीजिये, जितना हो सके उनके शेर गुनगुनाइये । वह एक भरपूर ज़िन्दगी जीकर गए । भरपूर ताक़त को जिया । हुक़ूमत को अपने पांव पर झुकते देखा तो कभी हुक़ूमत के सोफों पर पूरी धमक से बैठे । कलम और मंच की धाक को भरपूर जिया,जिसके सर पर हाथ रखा, वह बन गया । जिसके पांव खींचे, उसकी ज़मीन भी निकल गई । भरपूर ताक़त से ज़िन्दगी गुज़ारीइसलिए अब उस भीड़ का क्या हो रोना,जो कल उसी शहर की किसी ताक़तवर शय के पीछे जा बिछेगी....
भीड़ आएगी,जाएगी मगर जो बाद तक रहेगा,वह है काम...और बशीर बद्र उसमें बहुत लंबे वक़्त तक जिंदा रहेंगे...भीड़ ने इधर जिस तरह अपना चरित्र दिखाया है । वह न भी हो तो ग़म नही और हुक़ूमत,उसके बारे में कुछ कहना वक़्त की बर्बादी है...
#hashtag हफ़ीज़ किदवई
सच का वजन अगर एक डाक टिकट जितना भी होता, तो आज के प्रधानमंत्री की जुबान उसे उठा न पाती।
इतिहास अगर आईना है, तो मौजूदा सत्ता उस पर कालिख पोतने की लगातार कोशिश में है।
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मोदी ने गुजरात की एक चुनावी रैली में दावा किया था ,
“सरदार पटेल तो PoK वापस लेना चाहते थे, लेकिन उन्हें रोक दिया गया।”
इस एक पंक्ति में न सिर्फ़ इतिहास की चीर-फाड़ है, बल्कि उस सरदार पटेल का अपमान भी है जिन्हें ये सत्ता आज अपना प्रतीक बनाना चाहती है।
मगर आइए, ज़रा सरदार की असली आवाज़ में झाँकते हैं ,
4 जून 1948 को देहरादून से लिखी गई चिट्ठी में सरदार वल्लभभाई पटेल ने गोपालस्वामी अय्यंगार को लिखा...
“The military position is none too good, and I am afraid our military resources are strained to the uttermost. How long we are to carry on this unfortunate affair, it is difficult to foresee.”
यानि एक साफ़ और ईमानदार स्वीकार कि सैन्य स्थिति ठीक नहीं है। देश की फौजी क्षमता अपनी हदों पर है। और यह अफसोसनाक मामला कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है।
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क्या ये वही व्यक्ति हैं, जिन्हें आज के प्रधानमंत्री, बुलेट ट्रेन की स्पीड से PoK में घुसते दिखा रहे हैं?
सरदार पटेल जमीनी हकीकत को समझते थे। वे सेनाध्यक्ष नहीं थे, लेकिन उन्हें सेना की सीमाएं मालूम थीं। वे राष्ट्रभक्त थे, लेकिन रोमांटिक राष्ट्रवाद के नारेबाज़ नहीं थे।
उनका राष्ट्रवाद हकीकत की ज़मीन पर खड़ा था, ट्विटर के ट्रेंड्स पर नहीं।
दरअसल ये कोई पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार ने इतिहास के कद्दावर चेहरों को जबरन भगवा फ्रेम में जड़ने की कोशिश की हो।
नेहरू को कमजोर और अदूरदर्शी साबित करने की यह सरकारी आदत, अब पटेल को अधूरा विजेता साबित करने में बदल रही है ताकि अपनी वीरता का मुकुट सजाया जा सके।
लेकिन जब इतिहास सबूत से बोला जाता है, तब झूठ की हुकूमत शर्मिंदा होती है।
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सवाल है... क्या सरदार पटेल भी राष्ट्रविरोधी थे? क्या उनका यह कथन कि हम militarily strained हैं , देश को कमज़ोर करने वाली बात थी?
या फिर, जो भी वर्तमान सत्ता के नरेटिव में फिट न हो, उसे झूठा, कमजोर और देशद्रोही बताना भाजपा का एक आदतन राजनीतिक अभ्यास बन चुका है?
प्रधानमंत्री जी, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको बार-बार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और कांग्रेस के ऐतिहासिक नेताओं की छाया में खड़ा होना पड़ता है,
क्योंकि आपकी विचारधारा का स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था।
आपके पास अपना कोई आदर्श नहीं, इसलिए आप पटेल को, बोस को, कभी-कभी गांधी तक को अपनी कठपुतली की तरह पेश करना चाहते हैं।
मगर इतिहास कोई आपकी स्तुति में बनी फिल्में नहीं है, जिसे चुनाव के वक्त चला दिया जाए।
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सरदार पटेल एक विचार थे ... एक लोहे की रीढ़ वाले नेता।
वे न नारा लगाते थे, न टीवी डिबेट करते थे।
वे मैदान में रहते थे, संघर्ष करते थे, और कागज़ पर अपने निर्णयों को साफ़-साफ़ लिखते थे।
उनकी 1948 की चिट्ठी यही कहती है कि देश युद्ध से थका हुआ है, और PoK को लेकर आगे की रणनीति सैन्य क्षमता नहीं, राजनीतिक संतुलन से बनेगी।
आपके जैसे लोग इस संतुलन को कमज़ोरी कहेंगे,
क्योंकि आपको ज़हर बेचने की राजनीति आती है, इतिहास समझने की विनम्रता नहीं।
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प्रधानमंत्री जी,
सरदार पटेल को भाजपा का पोस्टर बॉय बनाना बंद कीजिए।
वे आपके नहीं थे।
वे कांग्रेस के थे।
वे भारत के थे।
और भारत के रहेंगे।
अगर आपकी राजनीति इतनी खोखली है कि उसे सच्चे इतिहास के सहारे खड़ा नहीं किया जा सकता, तो कृपया कम से कम झूठ के पुलों पर मत चढ़ाइए।
वरना एक दिन इतिहास भी यही कहेगा कि जब सच को झूठ कहा गया, तब भी कुछ लोग सरदार पटेल की चिट्ठियाँ पढ़ रहे थे।
इतिहास को दो कौड़ी की चुनावी पटकथा समझने की बीमारी जब हद से बढ़ती है, तब पब्लिक स्पीच नहीं, पब्लिक धोखा सुनने को मिलता है।
दरअसल, जिस मजबूती से मोदी सरकार हर कांग्रेस नेता की मूरत पर भगवा रंग पोत देना चाहती है, उससे न इतिहास बचा है, न बेशर्मी।
सरदार पटेल ने क्या सोचा, क्या लिखा, किसे लिखा ,सब उपलब्ध है। सिर्फ़ ढूंढने की ज़हमत चाहिए। मगर ज़हमत तो उन्हें होती है जो जवाबदेह होते हैं।
आपसे विनम्र आग्रह है सरदार पटेल को गलत कोट करना बंद कीजिए।
इतिहास को रोज़-रोज़ झूठ की गटर से खींचकर मंच पर लाना देश का नहीं, सिर्फ़ आपकी पार्टी का प्रचार है।
और ये प्रचार, बहुत महंगा पड़ेगा भविष्य में देश में भी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी।
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#VijayShukla
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